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शहीदों के सपने बनाम आज का भारत
शहीदों के सपनों और आज के भारत के बीच का कड़वा सच। यह लेख नागरिक मौन, मूल्यों की गिरावट और लोकतंत्र की आत्मा पर तीखे सवाल उठाता है।
लोकतंत्र और जनशक्तिविचारधारा
रोहित थपलियाल
1/26/2026
शहीदों के सपने बनाम आज का भारत
शहीदों ने जो सपना देखा था, वह सत्ता का नहीं था
जब भगत सिंह फाँसी के तख्ते पर चढ़े,
तो उनके मन में कोई कुर्सी नहीं थी,
कोई मंत्रालय नहीं था,
कोई सत्ता नहीं थी।
उनका सपना था—
“ऐसा भारत जहाँ
न कोई भूखा हो,
न कोई डरा हुआ हो,
और न कोई इतना ताक़तवर
कि क़ानून से बड़ा बन जाए।”
आज अगर वे लौटें,
तो शायद पहला सवाल यह न पूछें कि
“देश कितना बड़ा हो गया?”
बल्कि यह पूछें—
“देश कितना ईमानदार रह गया?”
शहीदों के सपनों का भारत: कैसा था वह विचार?
शहीदों का भारत
भीड़ नहीं, चेतन नागरिकों का देश था
जहाँ धर्म आत्मा का विषय था,
राजनीति का हथियार नहीं
जहाँ शिक्षा नौकरी नहीं,
विवेक पैदा करती थी
जहाँ सत्ता सेवा थी,
व्यापार नहीं
महात्मा गांधी का सपना था
कि आख़िरी आदमी
सबसे पहले दिखे।
सुभाष चंद्र बोस का सपना था
कि भारत कभी
डरकर न जिए।
आज का भारत: एक कड़वा लेकिन ज़रूरी सच
और अब…
सवालों का सबसे असहज दौर।
आज का भारत—
ज़्यादा बोलता है,
कम सुनता है
ज़्यादा भावुक है,
कम विवेकशील
ज़्यादा नारे जानता है,
कम संविधान
हमने
धर्म को पहचान पत्र बना दिया
राजनीति को ध्रुवीकरण का खेल
मीडिया को शोर
और नागरिक को दर्शक
यह वही भारत है
जहाँ—
अन्याय देखकर
हम मोबाइल निकालते हैं,
आवाज़ नहीं।
सबसे बड़ा विश्वासघात: नागरिक का मौन
शहीदों ने देश के लिए
अपना जीवन दिया।
हम क्या देते हैं?
वोट? वह भी सोच-समझकर नहीं
आवाज़? केवल सोशल मीडिया पर
ईमानदारी? “मौका मिले तो…”
हम भूल गए कि
लोकतंत्र मरता नहीं है,
वह चुप करा दिया जाता है।
और यह चुप्पी
किसी तानाशाह ने नहीं,
हमने खुद चुनी है।
अगर आज शहीद आईना दिखाएँ
वे शायद कहें
“हमने अंग्रेज़ों से आज़ादी छीनी थी,
तुमने उसे
आराम में गिरवी रख दिया।”
“हमने जान दी थी
ताकि तुम सवाल पूछ सको,
तुमने सवाल पूछने वालों को
ग़द्दार कह दिया।”
यह आरोप नहीं है।
यह चेतावनी है।
फिर भी… उम्मीद क्यों ज़िंदा है?
क्योंकि भारत
अब भी ज़िंदा है
क्योंकि
आज भी कोई शिक्षक
अंधेरे में दीपक बनता है
कोई डॉक्टर
मुनाफ़े से पहले मानवता चुनता है
कोई युवा
सवाल पूछने की हिम्मत करता है
यही वे लोग हैं
जिन्हें देखकर
शहीद शायद कहते हों—
“सब खत्म नहीं हुआ है।”
अब फैसला हमारे हाथ में है
यह भाग यहीं खत्म नहीं होता।
यह आप पर शुरू होता है।
आज सवाल यह नहीं है कि
देश किस दिशा में जा रहा है?
असल सवाल यह है—
“हम किस दिशा में खड़े हैं?”
अगर हम
सच का साथ देंगे
नफ़रत से इनकार करेंगे
और नागरिक होने को
गर्व नहीं, कर्तव्य मानेंगे
तो यक़ीन मानिए—
शहीदों के सपने
इतिहास नहीं ,
भविष्य बनेंगे।
रोहित थपलियाल
स्वतंत्र भारतीय लेखक और सामाजिक पर्यवेक्षक
(DeshDharti360.com)
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