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देशवासियों को 26 जनवरी की हार्दिक शुभकामनाएँ
भारत की आज़ादी के बाद से आज तक की आत्मा को छू लेने वाली कहानी। 26 जनवरी के ऐतिहासिक महत्व, शहीदों के बलिदान, संविधान के मूल्यों, हमारी उपलब्धियों और उन कमियों का मार्मिक विश्लेषण, जो आज भी हमें एक ज़िम्मेदार राष्ट्र बनने से रोकती हैं। यह लेख हर नागरिक को अपने कर्तव्य और देश के प्रति जागरूक होने का आह्वान करता है।
लोकतंत्र और जनशक्तिविचारधारा
रोहित थपलियाल
1/26/2026
प्रिय देशवासियो,
26 जनवरी की शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिए।
यह शुभकामना किसी औपचारिक संदेश की तरह नहीं,
बल्कि संविधान की प्रस्तावना से उठी हुई पुकार की तरह होनी चाहिए—
“मैं भारत का नागरिक हूँ,
और यह देश केवल मेरा अधिकार नहीं—
मेरा कर्तव्य भी है।”
26 जनवरी वह दिन है,
जब भारत ने दुनिया को बताया कि
हम केवल आज़ाद नहीं हैं—
हम स्वयं को संचालित करने में सक्षम हैं।
26 जनवरी का महत्व: क्यों यह दिन केवल परेड नहीं है
15 अगस्त 1947 को हमने आज़ादी पाई,
लेकिन 26 जनवरी 1950 को हमने दिशा पाई।
अगर 15 अगस्त शरीर की मुक्ति थी,
तो 26 जनवरी आत्मा का संविधान है।
इस दिन—
भारत ने औपनिवेशिक कानूनों को त्यागा
जनता को शासक का नहीं,
संविधान का अधीन बनाया
राजा नहीं,
क़ानून सर्वोच्च बना
यही कारण है कि
26 जनवरी केवल झंडा फहराने का दिन नहीं,
यह आत्ममंथन का दिन होना चाहिए।
संविधान: वह ग्रंथ जो बंदूक से नहीं, बुद्धि से लिखा गया
भारतीय संविधान
किसी एक विचारधारा का दस्तावेज़ नहीं—
यह हज़ारों वर्षों के अनुभव का निचोड़ है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था—
“संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो,
अगर उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं,
तो वह असफल हो जाएगा।”
26 जनवरी हमें याद दिलाता है कि—
हमें अधिकार मिले हैं, लेकिन कर्तव्य भी
हमें आज़ादी मिली है, लेकिन अनुशासन भी
अब प्रश्न उठता है—यह संविधान किनके बलिदान पर खड़ा है?
और यहीं से
यह लेख इतिहास से हटकर
अंतरात्मा की ओर मुड़ता है।
वे लोग जिन्होंने भारत को सपने में नहीं, रक्त में देखा
जब हम आज़ादी कहते हैं,
तो वह एक शब्द नहीं—
एक चिता है, जिस पर हज़ारों सपने जले हैं।
भगत सिंह
हँसते-हँसते फाँसी चढ़ गए,
क्योंकि वे जानते थे—
डर से आज़ादी नहीं मिलती।
सुभाष चंद्र बोस
ने कहा—
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”
महात्मा गांधी
ने बिना हथियार सिखाया कि
सत्य सबसे बड़ा अस्त्र है।
उन्होंने यह नहीं पूछा—
“आज का भारत कैसा होगा?”
उन्होंने भरोसा किया—
“आने वाली पीढ़ी बेहतर बनाएगी।”
हमने उनके मूल्यों से क्या पाया?
आज अगर कोई शहीद
भारत को देखे,
तो वह गर्व भी करेगा।
हमने लोकतंत्र को जिंदा रखा
हमने संविधान को स्वीकार किया
हमने विज्ञान, अंतरिक्ष, तकनीक में नाम कमाया
हमने दुनिया को दिखाया कि
एक गरीब देश भी आत्मसम्मान रख सकता है
चंद्रमा पर तिरंगा,
डिजिटल लेनदेन में नेतृत्व,
विश्व मंच पर भारत की आवाज़—
यह सब साधारण उपलब्धियाँ नहीं हैं।
लेकिन अब वह हिस्सा, जहाँ नज़रें झुकती हैं
अगर शहीद आज लौट आएँ,
तो वे शायद पूछें—
“क्या यही वह समाज था
जिसके लिए हमने जान दी?”
हमने—
नागरिकता को सुविधा बना दिया
चुनाव को कर्तव्य नहीं, पहचान की लड़ाई बना दिया
सवाल पूछने वालों को देशद्रोही कहना शुरू किया
ईमानदारी को मूर्खता समझने लगे
सबसे बड़ा धोखा यह हुआ कि
हमने कहा
“देश को सरकार चलाती है।”
नहीं।
देश हम चलाते हैं
या बिगाड़ते हैं।
26 जनवरी पर हमें क्या पूछना चाहिए?
यह दिन पूछता है
क्या हम संविधान पढ़ते हैं, या सिर्फ़ नारा बनाते हैं?
क्या हम न्याय चाहते हैं, या सिर्फ़ अपने लिए?
क्या हम शहीदों का सम्मान मौन से करते हैं,
या केवल पोस्ट से?
शुभकामनाएँ तब सार्थक होंगी जब…
26 जनवरी की शुभकामना
तभी सच्ची होगी,
जब
हम रिश्वत से इनकार करें
नफ़रत से दूरी बनाएँ
सच बोलने की हिम्मत रखें
और सबसे ज़रूरी
खुद से सवाल करें
अंत नहीं, एक प्रतिज्ञा
आज, इस गणतंत्र दिवस पर,
अगर हम इतना कह सकें—
“मैं एक बेहतर नागरिक बनूँगा”
तो यक़ीन मानिए—
किसी शहीद की आत्मा
आज मुस्कुरा उठेगी।
गणतंत्र दिवस की पुनः हार्दिक शुभकामनाएँ
यह तिरंगा केवल झंडा नहीं
यह जिम्मेदारी है।
रोहित थपलियाल
स्वतंत्र भारतीय लेखक और सामाजिक पर्यवेक्षक
(DeshDharti360.com)
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