पर्यावरण

पर्यावरण केवल हमारे चारों ओर मौजूद प्रकृति नहीं है,
यह मानव सभ्यता की साँस है।
जब हवा शुद्ध होती है, तो विचार भी शुद्ध होते हैं।
जब नदियाँ जीवित होती हैं, तो समाज में भी जीवन बहता है।

आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है
जहाँ विकास और विनाश के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है।
पेड़ों की कटाई, जल स्रोतों का सूखना, बढ़ता प्रदूषण और बदलता जलवायु संतुलन
यह सब केवल वैज्ञानिक आँकड़े नहीं हैं —
यह प्रकृति की ओर से चेतावनी पत्र हैं।

DeshDharti360.com का “पर्यावरण” खंड
इन्हीं चेतावनियों को आँख खोलने वाली भाषा में प्रस्तुत करता है।
यहाँ पर्यावरण को केवल समस्या के रूप में नहीं,
बल्कि समाधान और जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है।

इस खंड में आप पढ़ेंगे —

भारत में जल संकट की जमीनी सच्चाई

जलवायु परिवर्तन के सामाजिक और मानवीय प्रभाव

धरती माँ के साथ हमारा टूटता हुआ संबंध

जंगल, नदियाँ और पहाड़ — जो केवल संसाधन नहीं,
बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं

हमारा प्रयास है कि पाठक
सिर्फ जानकारी न ले,
बल्कि अंदर से प्रश्न पूछे
क्या हम आने वाली पीढ़ियों को एक जीवित धरती सौंप पाएँगे?

यह खंड न तो डर फैलाने के लिए है,
और न ही केवल आलोचना करने के लिए।
यह एक जागरूक संवाद है —
जहाँ समाधान, सामूहिक प्रयास और व्यक्तिगत जिम्मेदारी
तीनों पर बराबर ज़ोर दिया गया है।

यदि आप मानते हैं कि
पर्यावरण की रक्षा केवल सरकार का नहीं,
बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है —
तो यह खंड आपके लिए है।

धरती बचेगी, तभी देश बचेगा।
और देश बचेगा, तभी भविष्य होगा।