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जनशक्ति बनाम नेतागिरी – शहीद किस भारत के लिए मरे थे?

जनशक्ति बनाम नेतागिरी पर तीखा आत्ममंथन। क्या शहीद सत्ता के लिए मरे थे या जागरूक नागरिकों के भारत के लिए? पढ़ें जागरणकारी समापन लेख।

लोकतंत्र और जनशक्तिविचारधारा

रोहित थपलियाल

2/27/2026

प्रश्न जो हमें असहज करता है

अब हम उस अंतिम प्रश्न पर पहुँचते हैं
वह प्रश्न जिससे अक्सर हम बचना चाहते हैं,
क्योंकि उसका उत्तर बाहर नहीं, भीतर छिपा है।

“शहीद किस भारत के लिए मरे थे
नेतागिरी के लिए या जनशक्ति के लिए?”

यह प्रश्न किसी राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं है।
यह इतिहास और वर्तमान के बीच खड़ी
एक नैतिक दीवार है।

और इस दीवार के सामने
हर नागरिक को अकेले खड़ा होना पड़ता है।

नेतागिरी क्या है? — सत्ता का विकृत रूप

नेतृत्व और नेतागिरी में अंतर है।

नेतृत्व सेवा है।
नेतागिरी नियंत्रण है।

नेतृत्व जिम्मेदारी है।
नेतागिरी अवसर है।

नेतृत्व पारदर्शिता है।
नेतागिरी चालाकी है।

जब सत्ता सेवा नहीं, नियंत्रण बन जाए
वहाँ नेतागिरी जन्म लेती है।

जब राजनीति विचार नहीं, गणित बन जाए
वहाँ नेतागिरी फलती है।

जब जनमत भावनाओं से संचालित हो
वहाँ नेतागिरी सुरक्षित रहती है।

नेतागिरी अचानक नहीं आती।
वह जनता की कमजोरी से जन्म लेती है।

जहाँ प्रश्न कम और जयकार अधिक हो,
जहाँ विवेक कम और उत्तेजना अधिक हो,
वहाँ नेतागिरी पनपती है।

जनशक्ति क्या है? — राष्ट्र की असली शक्ति

जनशक्ति भीड़ नहीं है।
जनशक्ति जागरूक नागरिक है।

जब नागरिक सजग हो ,
तभी जनशक्ति है।

जब प्रश्न पूछना देशभक्ति माना जाए ,
तभी जनशक्ति है।

जब सत्य असुविधाजनक होने पर भी स्वीकार किया जाए ,
तभी जनशक्ति है।

जनशक्ति का अर्थ केवल वोट देना नहीं।
जनशक्ति का अर्थ है
सत्ता को आईना दिखाना।

लोकतंत्र में जनता मालिक है।
लेकिन यदि मालिक सो जाए,
तो प्रबंधक मालिक बन बैठता है।

सच्चाई जो हम स्वीकार नहीं करना चाहते

नेतागिरी जनता की कमजोरी से जन्म लेती है।
और जनशक्ति जनता की जागरूकता से।

यदि नागरिक मौन है,
तो नेतागिरी मजबूत होगी।

यदि नागरिक सजग है,
तो नेतागिरी जवाबदेह होगी।

समस्या केवल सत्ता में नहीं है।
समस्या समाज की मानसिकता में है।

हमने आलोचना को देशद्रोह समझना शुरू किया।
हमने प्रश्न को विरोध मान लिया।
हमने विचार को विभाजन समझ लिया।

और यहीं लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगीं।

शहीद किस भारत के लिए मरे थे?

जब भगत सिंह ने फाँसी स्वीकार की,
तो वे किसी विशेष दल के लिए नहीं मरे थे।
वे एक ऐसे भारत के लिए मरे थे
जहाँ अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना अपराध न हो।

जब सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फौज बनाई,
तो उनका लक्ष्य केवल अंग्रेज़ों को हटाना नहीं था।
उनका सपना आत्मसम्मान था।

जब महात्मा गांधी ने सत्याग्रह किया,
तो वह किसी कुर्सी की लड़ाई नहीं थी।
वह आत्मबल की लड़ाई थी।

उन्होंने वह भारत चाहा था

जहाँ प्रश्न पूछना अपराध न हो

जहाँ नागरिक जाति-धर्म से ऊपर उठ सके

जहाँ संविधान पुस्तकालय में नहीं, व्यवहार में दिखे

जहाँ सत्ता जनता से डरे, जनता सत्ता से नहीं

उन्होंने वह भारत नहीं चाहा था
जहाँ नागरिक दर्शक बन जाए।

उन्होंने वह भारत चाहा था
जहाँ नागरिक ही राष्ट्र हो।

आज का आईना

आज हमें स्वयं से पूछना होगा

क्या हम दर्शक बन गए हैं?

हम टीवी बहस देखते हैं,
सोशल मीडिया पर बहस करते हैं,
पर क्या ज़मीन पर खड़े होते हैं?

हम भ्रष्टाचार की निंदा करते हैं,
पर क्या रिश्वत से इनकार करते हैं?

हम नेताओं को दोष देते हैं,
पर क्या मतदान करते समय विवेक से निर्णय लेते हैं?

जनशक्ति की कमी वहीं दिखती है
जहाँ भीड़ अधिक और विचार कम होते हैं।

लोकतंत्र का असली संकट

लोकतंत्र तानाशाही से नहीं मरता।
वह धीरे-धीरे नागरिक के भीतर मरता है।

जब नागरिक कहता है
“मुझे क्या लेना-देना”
तो लोकतंत्र कमजोर होता है।

जब नागरिक कहता है
“सब ऐसे ही चलता है”
तो लोकतंत्र घायल होता है।

जब नागरिक कहता है
“सवाल मत पूछो”
तो लोकतंत्र खामोश हो जाता है।

अब निर्णय हमारा है

यह लेख किसी दल के खिलाफ नहीं।
यह किसी नेता के खिलाफ नहीं।

यह हमारे भीतर सोई हुई जनशक्ति को जगाने का प्रयास है।

यदि हम

सच बोलने का साहस रखें

मतदान को धर्म मानें

कर्तव्य को अधिकार से पहले रखें

और संविधान को केवल प्रतीक नहीं, व्यवहार बनाएं

तो शहीदों के सपने
इतिहास नहीं रहेंगे।
वे भविष्य बनेंगे।

अंतिम संदेश : संकल्प का क्षण

26 जनवरी की शुभकामनाएँ
तभी सार्थक होंगी
जब हम यह संकल्प लें

“मैं एक बेहतर नागरिक बनूँगा।”

देश बदलना कठिन है।
स्वयं बदलना संभव है।

और जब नागरिक बदलता है,
तो राष्ट्र बदलता है।

समापन प्रश्न

मित्र,
अब यह आपसे है

क्या हम नेतागिरी को दोष देते रहेंगे?
या जनशक्ति बनकर इतिहास की दिशा बदलेंगे?

क्योंकि अंततः
शहीदों ने भारत को हमें सौंपा था।
सत्ता को नहीं।

रोहित थपलियाल
स्वतंत्र भारतीय लेखक और सामाजिक पर्यवेक्षक
(DeshDharti360.com)

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