सवाल पूछना असभ्यता कब बन गया?
आज सवाल पूछना असहज क्यों हो गया? नागरिक चेतना और प्रश्न संस्कृति पर एक गहन वैचारिक चिंतन।
लोकतंत्र और जनशक्तिविचारधारा
रोहित थपलियाल
2/28/2026
प्रस्तावना | एक बदलती हुई परिभाषा
कभी सवाल पूछना जिज्ञासा का प्रतीक था।
यह सीखने की प्रक्रिया का पहला चरण माना जाता था।
समाज, परिवार और संस्थाएँ प्रश्नों को विकास का संकेत समझती थीं।
लेकिन आज स्थिति बदलती हुई दिखाई देती है।
अब प्रश्न अक्सर असहजता उत्पन्न करते हैं।
कई बार वे संवाद का माध्यम बनने के बजाय तनाव का कारण बन जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि प्रश्नों की आवश्यकता समाप्त हो गई है।
बल्कि, उनकी सामाजिक स्वीकृति कम हो गई है।
यह परिवर्तन धीरे-धीरे आया है
व्यवहार में, भाषा में और अपेक्षाओं में।
जब प्रश्न कम होते हैं,
तो नागरिक धीरे-धीरे मौन को स्वीकार करने लगता है।
इस स्थिति को हमने
“जब नागरिक चुप हो जाता है, व्यवस्था लापरवाह हो जाती है”
में विस्तार से समझा है।
🔹 सवाल का डर
आज नागरिक प्रश्न इसलिए नहीं टालता कि उसे जानकारी नहीं चाहिए,
बल्कि इसलिए टालता है क्योंकि उसे प्रतिक्रिया की चिंता होती है।
उसे लगता है कि:
उसके प्रश्न को चुनौती समझा जाएगा
उसे नकारात्मक दृष्टि से देखा जाएगा
या उसे असहयोगी माना जाएगा
ऐसी स्थिति में व्यक्ति प्रश्न करने से पहले ही स्वयं को रोक लेता है।
यह डर स्पष्ट नहीं होता,
लेकिन व्यवहार में दिखाई देता है
बैठकों में, सार्वजनिक संवाद में,
और यहाँ तक कि दैनिक जीवन के छोटे निर्णयों में भी।
यह झिझक केवल व्यक्तिगत नहीं,
बल्कि सामाजिक अलगाव से भी जुड़ी होती है।
इस पर हमने
“भीड़ में अकेला नागरिक: क्या हम सच में जुड़े हैं?”
में चर्चा की है।
🔹 व्यवस्था की सुविधा
जब प्रश्न कम होते हैं,
तो प्रक्रियाएँ बिना समीक्षा के चलने लगती हैं।
यह सुविधा दिखने में सकारात्मक लग सकती है,
लेकिन दीर्घकाल में यह जवाबदेही को कम करती है।
कोई भी व्यवस्था तभी प्रभावी रहती है
जब उसे समय-समय पर समझा और परखा जाए।
प्रश्न उस प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
जब समाज प्रश्न पूछना कम करता है,
तो व्यवस्था की पारदर्शिता धीरे-धीरे कम हो जाती है।
जब निगरानी कम होती है,
तो दुर्घटनाएँ केवल घटनाएँ नहीं रह जातीं,
बल्कि संकेत बन जाती हैं।
इस संदर्भ को समझने के लिए पढ़ें
“नागरिक चेतना और व्यवस्था की जिम्मेदारी”
🔹 सामाजिक दबाव
प्रश्न करने का व्यवहार केवल प्रशासनिक नहीं,
सामाजिक संदर्भों से भी प्रभावित होता है।
जब किसी समूह में सामंजस्य को प्राथमिकता दी जाती है,
तो असहमति व्यक्त करना कठिन हो सकता है।
इस स्थिति में प्रश्न करना
असभ्यता नहीं,
बल्कि असुविधा का कारण माना जाने लगता है।
धीरे-धीरे यह धारणा बन जाती है कि
“शांति बनाए रखना”
“समझने” से अधिक महत्वपूर्ण है।
सामाजिक सहमति की यह प्रवृत्ति
कई बार व्यवस्था को बिना प्रश्न के स्वीकार कर लेती है।
इसी मानसिकता के प्रभाव को
“गड्ढे, हादसे और सिस्टम”
जैसे विश्लेषणात्मक लेखों में समझा जा सकता है।
🔹 प्रश्न और चेतना
चेतना केवल सूचना से नहीं बनती।
वह तब विकसित होती है
जब व्यक्ति जानकारी को समझने का प्रयास करता है।
यह समझ प्रश्नों से ही उत्पन्न होती है।
जब प्रश्न समाप्त हो जाते हैं,
तो ज्ञान स्थिर हो जाता है।
और स्थिर ज्ञान
परिवर्तन के अनुरूप नहीं रह पाता।
🔹 संवाद बनाम विरोध
प्रश्न को अक्सर विरोध समझ लिया जाता है।
लेकिन प्रश्न का उद्देश्य विरोध नहीं,
समझ और स्पष्टता होता है।
जब हर प्रश्न को चुनौती माना जाता है,
तो संवाद की प्रक्रिया कमजोर हो जाती है।
संवाद का स्थान अनुमान ले लेता है,
और संबंधों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
🔹 नागरिक की भूमिका
किसी भी समाज की गुणवत्ता
उसके नागरिकों की सहभागिता से तय होती है।
प्रश्न करना सहभागिता का एक रूप है।
यह व्यवस्था के विरुद्ध नहीं,
उसके सुधार के पक्ष में होता है।
जब नागरिक प्रश्न करते हैं,
तो वे प्रक्रियाओं को बेहतर बनाते हैं।
प्रश्न की संस्कृति ही वह आधार है
जिससे सक्रिय नागरिक समाज बनता है।
आगे इसी पर चर्चा होगी
“जनशक्ति: भीड़ नहीं, जिम्मेदारी”
🔹 अंतिम विचार
सवाल पूछना असभ्यता नहीं है।
यह समझ का साधन है।
यदि किसी समाज में प्रश्न असहज लगने लगें,
तो संभव है कि समस्या प्रश्नों में नहीं,
बल्कि उनके प्रति दृष्टिकोण में हो।
✍️ Rohit Thapliyal
Independent Indian Writer & Social Observer
DeshDharti360.com



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