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जब नागरिक डरकर चुप रहता है तब व्यवस्था निडर होकर लापरवाह हो जाती है
नागरिक चुप्पी और व्यवस्था की जिम्मेदारी: शंकराचार्य विवाद से नोएडा हादसे तक
लोकतंत्र और जनशक्तिविचारधारा
रोहित थपलियाल
1/20/2026
यह दुर्घटना नहीं, सिस्टम का पैटर्न है
नोएडा में एक युवा इंजीनियर पानी से भरे गड्ढे में डूबकर मर जाता है।
उसके पास फोन है, आवाज़ है, सांसें हैं —
पर व्यवस्था तक पहुँचने का रास्ता नहीं।
कुछ दिन पहले, शंकराचार्य को लेकर प्रशासन और परंपरा आमने-सामने खड़े दिखते हैं।
सम्मान, पद और पहचान पर बहस होती है।
लेकिन सवाल यह नहीं कि कौन सही है।
सवाल यह है —
इतनी घटनाओं के बाद भी हम चुप क्यों हैं?
यह दो अलग घटनाएँ नहीं हैं।
यह एक ही बीमारी के दो लक्षण हैं।
व्यवस्था यूँ ही नहीं बिगड़ती, उसे बिगड़ने दिया जाता है
व्यवस्था रातों-रात लापरवाह नहीं हो जाती।
उसे धीरे-धीरे यह भरोसा दिलाया जाता है कि—
कोई पूछने वाला नहीं
कोई रोकने वाला नहीं
और कोई जिम्मेदारी लेने वाला नहीं
जब सड़क पर गड्ढा खुला रहता है,
तो वह केवल प्रशासन की गलती नहीं होता।
वह उस नागरिक की भी हार होती है
जो रोज़ वहाँ से गुज़रता है,
तस्वीर खींचता है,
और फिर कहता है —
“किसी दिन ठीक हो जाएगा।”
शंकराचार्य विवाद: परंपरा नहीं, चेतना का प्रश्न
शंकराचार्य का पद केवल एक धार्मिक पद नहीं है।
वह भारतीय चेतना की एक जिम्मेदारी है।
जब उस पद को लेकर विवाद होता है
और प्रशासन उसे केवल फाइल और प्रक्रिया में बदल देता है,
तो दोष सिर्फ़ प्रशासन का नहीं होता।
दोष उस समाज का भी होता है
जो इसे सिर्फ़ “संतों का मामला” कहकर किनारे हो जाता है।
क्योंकि जिस समाज को अपनी परंपरा की चेतना समझ नहीं,
वह प्रशासन से संवेदनशीलता की उम्मीद कैसे करेगा?
नोएडा की मौत: हत्या किसने की?
सवाल सीधा पूछना चाहिए—
उस इंजीनियर को किसने मारा?
क्या पानी ने?
क्या गड्ढे ने?
या उस व्यवस्था ने
जिसे हमने सवालों से कभी परेशान ही नहीं किया?
लेकिन एक और नाम है इस सूची में—
हम।
क्योंकि जब हम पहले गड्ढे पर चुप रहे,
तो अगला गड्ढा किसी की कब्र बन गया।
नागरिक सबसे बड़ा भ्रम पाल चुका है
आज का नागरिक एक भ्रम में जी रहा है—
“व्यवस्था मेरी है,
पर जिम्मेदारी मेरी नहीं।”
यही भ्रम लोकतंत्र को खोखला करता है।
लोकतंत्र वोट डालने से नहीं चलता,
वह निगरानी, सवाल और दबाव से चलता है।
जहाँ नागरिक डरकर चुप हो जाता है,
वहाँ व्यवस्था बेधड़क ग़लत होने लगती है।
यह धर्म बनाम सड़क नहीं है
यह लेख धर्म बनाम प्रशासन नहीं है।
यह सड़क बनाम संत नहीं है।
यह लेख है—
चेतना बनाम चुप्पी का।
अगर हम शंकराचार्य के लिए आवाज़ नहीं उठाते,
तो हम अपनी चेतना छोड़ रहे हैं।
अगर हम सड़क की लापरवाही पर नहीं बोलते,
तो हम अपने जीवन की कीमत घटा रहे हैं।
दोनों में अपराध एक ही है —
चुप रहना।
कड़वा सत्य | व्यवस्था हमसे डरती क्यों नहीं?
व्यवस्था हमसे इसलिए नहीं डरती
क्योंकि हमने उसे डरने की वजह कभी दी ही नहीं।
हम नाराज़ होते हैं,
पर संगठित नहीं होते।
हम दुखी होते हैं,
पर सवाल नहीं पूछते।
हम पोस्ट लिखते हैं,
पर दबाव नहीं बनाते।
और फिर किसी दिन
कोई मर जाता है।
अंतिम चेतावनी | अब भी समय है
यह लेख किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं है।
यह चेताने के लिए है।
क्योंकि अगली बार—
वह गड्ढा किसी और का इंतज़ार कर रहा होगा
वह अपमान किसी और की चेतना पर होगा
और तब सवाल यह नहीं होगा कि
“किसकी गलती थी?”
सवाल होगा—
“क्या हम तब भी चुप थे?”
✍️ Rohit Thapliyal
Independent Indian Writer & Social Observer
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