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भीड़ में अकेला नागरिक: क्या हम सच में जुड़े हुए हैं?

आज का नागरिक भीड़ में रहते हुए भी अकेला क्यों है? सामाजिक जुड़ाव, जिम्मेदारी और चेतना के बदलते स्वरूप पर एक गहन वैचारिक लेख।

लोकतंत्र और जनशक्तिविचारधारा

रोहित थपलियाल

2/28/2026

प्रस्तावना | संपर्क है, संबंध नहीं

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं
जहाँ संपर्क बढ़ा है,
लेकिन संबंध घटे हैं।

हर हाथ में मोबाइल है,
हर दिन सैकड़ों संदेश आते हैं,
हर विषय पर राय मिलती है

फिर भी,
जब कोई अन्याय होता है,
तो समाज खड़ा नहीं होता।

क्यों?

क्योंकि जुड़ाव की हमारी समझ बदल चुकी है।
अब हम जुड़े नहीं हैं
हम सिर्फ़ दिखते हुए जुड़े हुए हैं।

यही दिखावटी जुड़ाव अक्सर उस स्थिति तक ले जाता है जहाँ नागरिक धीरे-धीरे चुप हो जाता है।
इस पर विस्तार से हमने लिखा है —
जब नागरिक चुप हो जाता है, व्यवस्था लापरवाह हो जाती है।”

अकेलापन: भीड़ के बीच की सच्चाई

आज का नागरिक अकेला इसलिए नहीं है
कि उसके पास लोग नहीं हैं।

वह अकेला इसलिए है
क्योंकि उसके पास साझा जिम्मेदारी नहीं है।

वह जानता है कि:

सड़क पर गड्ढा है

व्यवस्था में कमी है

सम्मान का प्रश्न है

लेकिन वह यह भी जानता है

“कोई और बोलेगा।”

यहीं से समाज टूटता है।
और नागरिक अकेला पड़ जाता है।

सोशल समाज: संवेदनहीन संरचना

हमने समाज को
संवेदना से नहीं,
सूचना से भर दिया है।

हम हर घटना जानते हैं,
लेकिन किसी के लिए खड़े नहीं होते।

क्योंकि हम सोचते हैं

“जानना ही पर्याप्त है।”

लेकिन जानना,
जिम्मेदारी नहीं बनाता।

जिम्मेदारी बनती है
जब हम अपने को उस घटना से जोड़ते हैं।

और आज हम
जुड़ना नहीं चाहते।

व्यवस्था और नागरिक का मौन समझौता

एक अदृश्य समझौता बन चुका है।

व्यवस्था कहती है:

“तुम चुप रहो,
मैं ढीली रहूँगी।”

और नागरिक कहता है:

“तुम ढीली रहो,
मैं बोलूँगा नहीं।”

इस समझौते का परिणाम है
निष्क्रिय समाज।

जहाँ अन्याय होता है,
लेकिन प्रतिरोध नहीं।

जहाँ दुर्घटनाएँ होती हैं,
लेकिन सवाल नहीं।

अकेलेपन का मनोविज्ञान

जब नागरिक अकेला महसूस करता है,
तो वह सत्य देखता है
लेकिन बोलता नहीं।

वह व्यवस्था को दोष देता है,
लेकिन जिम्मेदारी नहीं लेता।

वह सोचता है:

“मैं अकेला क्या करूँ?”

और यही विचार
व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।

क्योंकि:

अकेला नागरिक
सवाल नहीं करता।

नागरिक का अकेलापन ही वह स्थिति है
जहाँ सवाल पूछना असहज लगने लगता है।
यही प्रश्न हम आगे
“सवाल पूछना असभ्यता कब बन गया?”
में उठाएँगे।

चेतना का प्रश्न

चेतना केवल जानने से नहीं आती।

चेतना आती है
जब व्यक्ति स्वयं को
समाज से अलग नहीं मानता।

जब वह कहता है:

“यह समस्या मेरी नहीं है”
तो वह स्वयं को
समाधान से बाहर कर देता है।

और जब समाज के लोग
समाधान से बाहर खड़े हो जाते हैं,
तो व्यवस्था भीतर से खाली हो जाती है।

जुड़ाव की पुनर्परिभाषा

हमें जुड़ाव को फिर से समझना होगा।

जुड़ाव:

लाइक नहीं है

सूचना नहीं है

सहमति भी नहीं है

जुड़ाव है

जिम्मेदारी साझा करना।

जब तक हम
किसी और की समस्या को
अपनी समस्या नहीं मानते,
तब तक हम जुड़े हुए नहीं हैं।

जब जिम्मेदारी साझा नहीं होती,
तो समाज केवल दर्शक बन जाता है
और यही स्थिति व्यवस्था की ढील को सामान्य बना देती है।
इस मानसिकता को हमने
नागरिक चेतना और व्यवस्था की जिम्मेदारी”
में गहराई से समझा है।

अंतिम संवाद | आपसे

आप भीड़ में रहते हैं।
आप जानकारी रखते हैं।
आप व्यवस्था देखते हैं।

लेकिन सवाल यह नहीं कि
आप जानते हैं या नहीं।

सूचना से भरे समाज में भी
मानसिक दबाव और मौन क्यों बढ़ रहा है —
यह प्रश्न केवल सामाजिक नहीं, मनोवैज्ञानिक भी है।
इस पर चर्चा आगे
“डर और दूरी: नागरिक की चुप्पी का मनोविज्ञान”
में की जाएगी।

सवाल यह है

क्या आप स्वयं को
इस समाज का सक्रिय हिस्सा मानते हैं?

क्योंकि:

भीड़ में खड़ा व्यक्ति
समाज का हिस्सा नहीं होता।
जिम्मेदारी लेने वाला व्यक्ति
समाज बनाता है।

✍️ Rohit Thapliyal

Independent Indian Writer & Social Observer
DeshDharti360.com

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भीड़ में खड़ा एक अकेला भारतीय नागरिक, आसपास धुंधले लोग, चेहरे पर गहरी सोच और सामाजिक अलगाव का भाव।
भीड़ में खड़ा एक अकेला भारतीय नागरिक, आसपास धुंधले लोग, चेहरे पर गहरी सोच और सामाजिक अलगाव का भाव।