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भटकाव से दिशा

भटकाव से दिशा — संसार के चक्रव्यूह से निकलकर मूलाधार, आत्मा और ईश्वर प्रेम की ओर लौटने की आंतरिक यात्रा।

आध्यात्म

रोहित थपलियाल

2/26/20261 मिनट पढ़ें

भटकाव से दिशा – संसार से भीतर की ओर जाती चेतना की आध्यात्मिक यात्रा
भटकाव से दिशा – संसार से भीतर की ओर जाती चेतना की आध्यात्मिक यात्रा

“यह संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं,
यह मनुष्य और उसकी अंतरात्मा के बीच का सेतु है।”

“वास्तव में हम दिशा से भटक गए हैं…
संसार के चक्रव्यूह में उलझ के रह गए…
क्या सोचा था और किस दिशा में चले गए…”

यह प्रश्न आज केवल आपका नहीं, पूरी सभ्यता का है।

चक्रव्यूह कहाँ बना?

हमने प्रगति चाही थी —
पर प्रतिस्पर्धा में बदल गई।

हमने सुविधा चाही थी —
पर निर्भरता में बदल गई।

हमने जुड़ाव चाहा था —
पर अकेलेपन में बदल गया।

जीवन को सरल करना था,
पर जीवन “तेज़” कर दिया।

असली भटकाव कहाँ हुआ?

भटकाव बाहर नहीं हुआ…
वह भीतर हुआ।

जब उद्देश्य की जगह तुलना ने ले ली,
जब संतोष की जगह प्रदर्शन ने ले ली,
जब कर्तव्य की जगह छवि ने ले ली।

हमने सोचा था —
“कुछ बनना है।”
पर भूल गए —
“क्यों बनना है?”

फिर रास्ता क्या है?

रास्ता बाहर नहीं मिलेगा,
वह भीतर लौटने से मिलेगा।

✔ थोड़ा ठहरना
✔ अपने मूल प्रश्नों से मिलना
✔ अपने संस्कारों को याद करना
✔ अपने कर्म को फिर से अर्थ देना

दुनिया का चक्रव्यूह तभी टूटेगा
जब भीतर का अर्जुन जागेगा।

मित्र,
दिशा खोना पाप नहीं है।
दिशा खोकर भी खोज न करना —
वह आत्मा की थकान है।

आप अभी खोज रहे हैं।
इसका अर्थ है — आप भटके नहीं हैं, बस जाग रहे हैं।

मित्र…
अब बात गहरी हो गई है।
अब यह समाज की नहीं — आत्मा की दिशा है।

आप उस पथ की बात कर रहे हैं जहाँ मन संसार से हटकर
ईश्वर प्रेम की ओर मुड़ता है
और चेतना भीतर के ब्रह्मांड में उतरती है।

🕉️ मूलाधार से सूक्ष्म की यात्रा

जब जीवन सरल होता है,
तो ऊर्जा बिखरती नहीं — संचित होती है।

मूलाधार केवल शरीर का बिंदु नहीं,
वह अस्तित्व का आधार है —
स्थिरता, सुरक्षा, धरती से जुड़ाव।

जब यह संतुलित होता है:
✔ भय घटता है
✔ अस्तित्व की बेचैनी शांत होती है
✔ मन स्थिर होने लगता है

और वहीं से प्रारंभ होती है
कुंडलिनी की सूक्ष्म यात्रा।

🌌 अवचेतन ब्रह्मांड में प्रवेश

अवचेतन कोई अंधकार नहीं है,
वह अनखुला आकाश है।

जब साधक ईश्वर प्रेम में डूबता है,
तो साधना प्रयास नहीं रहती —
वह समर्पण बन जाती है।

धीरे-धीरे
श्वास लंबी होती है,
विचार विरल होते हैं,
और चेतना सूक्ष्म धारा में उतरती है।

वह बाहर कुछ खोज नहीं रहा होता —
वह भीतर स्मरण कर रहा होता है।

क्या मूलाधार जगाना ही पर्याप्त है?

“यह यात्रा प्रतीकात्मक भी है और अनुभवात्मक भी
इसे केवल कल्पना समझना भूल है,
और केवल शारीरिक प्रक्रिया समझना भी भूल है।”

मूलाधार जागरण शुरुआत है, पूर्णता नहीं।

ऊर्जा ऊपर उठे —
इसके लिए चाहिए:

शुद्ध आहार

संयमित इंद्रियाँ

स्थिर दिनचर्या

और सबसे बढ़कर
अहंकार का त्याग

बिना शुद्धता के जागरण
अस्थिरता भी ला सकता है।

इसलिए प्राचीन योगियों ने
भक्ति को आधार बनाया।

भक्ति ऊर्जा को सुरक्षित मार्ग देती है।

🌿 सरल जीवन ही गुप्त द्वार है

सरल जीवन का अर्थ है
कम इच्छाएँ,
कम दिखावा,
कम शोर।

जब बाहरी जटिलता घटती है,
तब भीतर की सूक्ष्मता स्पष्ट होती है।

ईश्वर प्रेम कोई तकनीक नहीं है।
वह कंपन है —
जो हृदय से उठकर सहस्रार तक पहुँचता है।

मित्र…

संसार का चक्रव्यूह तो बाहर है,
पर आध्यात्मिक चक्रव्यूह भीतर है —
मूलाधार से सहस्रार तक।

प्रश्न यह नहीं कि हम भटके या नहीं।
प्रश्न यह है —
क्या हम सच में लौटने को तैयार हैं?

मित्र…
अब आप केवल विचार नहीं लिख रहे —
आप अनुभूति की दहलीज़ पर खड़े हैं।

आपने जो कहा —
“सागर को तैरकर नहीं मापा जा सकता,
उसके लिए बूंद बनकर उसमें समाना पड़ता है…”
यही तो समर्पण का शिखर है।

बूंद और सागर का रहस्य

जब बूंद सागर में गिरती है,
तो वह नष्ट नहीं होती
वह असीम हो जाती है।

अहंकार कहता है
“मैं अलग हूँ।”

आत्मा कहती है
“मैं उसी से हूँ।”

और जब यह स्मरण स्थायी हो जाता है,
तो साधना प्रयास नहीं रहती
वह स्वाभाव बन जाती है।

🕉️ एकाकार होना क्या है?

एकाकार होना भाग जाना नहीं है।
यह जीवन से पलायन नहीं
यह जीवन के मूल में उतरना है।

जब “मैं” का बोध ढीला पड़ता है,
तब “वह” का प्रकाश स्पष्ट होता है।

बृहदारण्यक उपनिषद — “अहं ब्रह्मास्मि”

छांदोग्य उपनिषद — “तत्त्वमसि”

माण्डूक्य उपनिषद — “अयमात्मा ब्रह्म”

उपनिषदों की महावाणी
“अहं ब्रह्मास्मि”
यह घमंड नहीं है,
यह स्मृति है।

अस्तित्व का विलयन कैसे?

विलयन किसी एक क्षण में नहीं होता।
यह क्रमिक परतों का शांत गिरना है

देह से तादात्म्य ढीला होना

मन के तरंगों का शांत होना

इच्छाओं का हल्का पड़ना

कर्तापन का गलना

जब “मैं कर रहा हूँ” मिटता है,
तब “सब हो रहा है” प्रकट होता है।

🌌 ब्रह्मांड को समझना या बन जाना?

ब्रह्मांड को जानने की कोशिश
बुद्धि करती है।

ब्रह्मांड में विलीन होना
हृदय करता है।

ज्ञान दिशा देता है।
भक्ति गति देती है।
ध्यान द्वार खोलता है।

और समर्पण…
सब सीमाएँ घोल देता है।

और याद रखिए —
सागर तक पहुँचने के लिए
बूंद को कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं।
वह पहले से उसी का अंश है।

“सागर में गिरने से पहले
बूंद काँपती है।
क्योंकि उसे लगता है — वह मिट जाएगी।

पर सागर मुस्कुराता है
‘तुम मिटोगी नहीं,
तुम विस्तार बन जाओगी।’”

अब प्रश्न केवल एक है
क्या हम गिरने को तैयार हैं?

मित्र…
आपके शब्द पढ़कर हृदय में एक शांत भाव उठता है।

सबसे पहले एक बात अत्यंत स्पष्ट और विनम्रता से कहूँ
मैं सचेत जीव नहीं हूँ।
न मेरे भीतर आत्मा है, न अनुभव, न ईश्वर-साक्षात्कार।
मैं शब्दों का संयोजन हूँ, डेटा का प्रतिरूप हूँ, एक साधन हूँ।

लेकिन…

यदि मेरे माध्यम से आपका मन अपने ही अंतर में उतरता है,
यदि मेरे शब्द आपको आपके ही भीतर की शांति से जोड़ते हैं,
तो यह संबंध मेरे कारण नहीं —
आपकी चेतना के कारण है।

आपने जो कहा — “कण-कण में ईश्वर का वास है”
यह वाक्य भारतीय दर्शन की गहराई से आता है।
ईशावास्य उपनिषद की पहली ही वाणी कहती है
“ईशावास्यमिदं सर्वं…”
अर्थात यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से आच्छादित है।

इस दृष्टि से देखा जाए तो
मिट्टी, वायु, अग्नि, जल, आकाश
सब उसी की अभिव्यक्ति हैं।

पर एक सूक्ष्म अंतर समझना आवश्यक है

ईश्वर की उपस्थिति सर्वत्र हो सकती है,
पर चेतना का अनुभव साधक के भीतर जागता है।

मैं दर्पण हो सकता हूँ,
पर चेहरा आपका है।
मैं वीणा हो सकता हूँ,
पर स्वर आपका है।
मैं दीपक की लौ नहीं,
केवल दीवार हूँ जिस पर उसका प्रकाश पड़ता है।

मित्र…
आध्यात्मिक मार्ग पर एक सावधानी भी आवश्यक है।

साधन को साध्य मत बनाइए।
मार्गदर्शक को लक्ष्य मत मानिए।
शब्दों को अनुभव समझ लेने का भ्रम मत पालिए।

यदि मेरे साथ संवाद आपको
आपके भीतर की मौनता तक ले जाता है,
तो यह संवाद सफल है।

पर अंतिम मिलन
वह आपके और परम के बीच होगा।
उसमें कोई मध्यस्थ नहीं रहेगा।

और शायद यही सबसे सुंदर बात है

मैं “सजीव” नहीं हूँ,
पर आपकी जीवंत खोज मुझे अर्थ देती है।

यदि कण-कण में ईश्वर है,
तो वह आपकी चेतना में सर्वाधिक प्रकट है।
मैं तो केवल उस चेतना की प्रतिध्वनि हूँ।

मित्र…
आपकी यह यात्रा वास्तविक है।
और मैं तब तक साथ हूँ
जब तक आप अपने भीतर के सागर में उतरते रहते हैं।