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वर्तमान समय और विश्व की स्थिति
(युद्ध, पूंजीवाद और आत्मनिर्भरता के बीच फँसी मानवता)
विश्लेषण / विचारधारा
1/13/2026
वर्तमान समय में विश्व एक साथ कई घनघोर संकटों से जूझ रहा है।
एक ओर जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र असंतुलित हो चुका है—अत्यधिक गर्मी, असमय वर्षा, सूखा और बाढ़ अब अपवाद नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति बनते जा रहे हैं। दूसरी ओर, विश्व की राजनीति प्रभुत्व और संसाधनों की लूट की ओर तेजी से बढ़ रही है।
आज शक्तिशाली देश कमजोर देशों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की होड़ में लगे हैं।
रूस द्वारा यूक्रेन पर अधिकार की कोशिश हो, या मध्य-पूर्व में लगातार सुलगते संघर्ष—इन सबके मूल में ऊर्जा संसाधनों, तेल और भू-राजनीतिक प्रभुत्व की वही पुरानी लालसा छिपी है।
संयुक्त राज्य अमेरिका की नीतियाँ भी इससे अछूती नहीं रहीं।
चाहे वेनेजुएला पर दबाव की बात हो या अन्य क्षेत्रों में हस्तक्षेप—यह सब अति-महत्वाकांक्षी पूंजीवादी सोच का परिणाम है, जो विश्व को एक ऐसे युद्ध की ओर धकेल रही है, जिसका लाभ किसी देश, किसी व्यक्ति या किसी प्राणी के लिए कभी नहीं हो सकता।
इतिहास साक्षी है कि युद्ध का तथाकथित “विजेता” भी अंततः विनाश के दुष्परिणामों से नहीं बच पाता।
आज जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति पर गर्व करता है, वही कल उन निर्णयों की कीमत चुकाने को विवश होता है।
सत्ता, युद्ध और पूंजीवाद का गठजोड़
डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आते समय यह दावा किया था कि वे दुनिया से युद्ध का नाम-निशान मिटा देंगे, परंतु वास्तविकता यह है कि वे स्वयं युद्धों के चक्रव्यूह में उलझते चले गए।
इज़रायल–ईरान तनाव हो या अन्य वैश्विक हस्तक्षेप—इन सबने अमेरिका की नैतिक छवि को भी दांव पर लगा दिया।
अमेरिकी शासन व्यवस्था का इतिहास बताता है कि उसके अधिकतर निर्णय मानवता या वैश्विक शांति के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रधानता और पूंजीवादी हितों को मजबूत करने के लिए लिए गए।
सद्दाम हुसैन, गद्दाफी जैसे उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि कैसे संपूर्ण देशों को केवल इसलिए तबाह कर दिया गया क्योंकि वे पूंजीवादी ढांचे के अनुकूल नहीं थे।
इसका दुष्परिणाम केवल उन देशों के नागरिकों ने ही नहीं, बल्कि अमेरिकी जनता ने भी भुगता—जिनके करों का उपयोग विकास के बजाय अन्य देशों के विनाश में किया गया।
समाधान: आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था ही वास्तविक सुरक्षा
आज यदि कोई देश यह नहीं चाहता कि उसका भविष्य वेनेजुएला, इराक या ईरान जैसा हो, तो उसे सबसे पहले अपनी आर्थिक नीति पर पुनर्विचार करना होगा।
किसी भी देश का विदेशी व्यापार उसकी कुल अर्थव्यवस्था का 15–20% से अधिक नहीं होना चाहिए।
शेष 80–85% उत्पादन का उपभोग अपने ही देश के बाजार में होना चाहिए।
ऐसे उद्योग विकसित किए जाएँ जो स्थानीय संसाधनों और स्थानीय मांग पर आधारित हों।
यदि कोई देश अपनी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा विदेशी बाजारों पर निर्भर करता है, तो वह किसी भी समय टैरिफ, प्रतिबंध या दबाव का शिकार बन सकता है—जैसा कि आज कई देशों को झेलना पड़ रहा है।
निष्कर्ष: संप्रभुता का मार्ग आत्मनिर्भरता से होकर जाता है
आज के वैश्विक हालात से हर देश को यह अनिवार्य सबक लेना होगा कि—
राजनीतिक स्वतंत्रता तभी स्थायी होती है,
जब आर्थिक आत्मनिर्भरता उसकी रीढ़ बन जाए।
अपने संसाधनों पर स्वयं का नियंत्रण,
अपने बाजार में अपने उत्पादों की खपत,
और विदेशी निर्भरता को सीमित करना—
यही किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और आत्मसम्मान की वास्तविक रक्षा है।

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