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US-India व्यापार सौदा: तेल लॉबी बनाम गोबर गैस | आत्मनिर्भर भारत
US-India व्यापार सौदे के पीछे तेल लॉबी का दबाव, गोबर गैस जैसी देशी ऊर्जा की अनदेखी और आत्मनिर्भर भारत पर इसका प्रभाव। पर्यावरण, ऊर्जा सुरक्षा और धरती माँ की चेतावनी।
राष्ट्र-चिंतनभारतीय संस्कृति और चेतनागौमाता और गोसंस्कृतिपर्यावरण और धरती माँ
रोहित थपलियाल
2/6/2026
नमस्कार देश-धरती के साथियों,
आज की यह चर्चा केवल एक व्यापार समझौते तक सीमित नहीं है—
यह हमारी ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय भविष्य और आत्मनिर्भर भारत की दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
हाल ही में US–India व्यापार सौदे को लेकर जो तथ्य सामने आए हैं,
उन्होंने एक बार फिर सोचने पर मजबूर किया है—
क्या हम सच में धरती माँ के हित में निर्णय ले रहे हैं?
या फिर तेल लॉबी और शॉर्ट-टर्म फायदे हमारी नीतियों को चला रहे हैं?
तेल पर बढ़ती निर्भरता जहाँ प्रदूषण को बढ़ाती है,
वहीं गोबर गैस जैसी देशी और टिकाऊ ऊर्जा को लगातार हाशिये पर धकेला गया है।
आइए, पूरे चित्र को शांत मन से देखें।
US–India व्यापार सौदे का दूसरा पहलू
फरवरी 2026 में घोषित इस डील में
अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों पर टैरिफ घटाए गए।
यह देखने में एक एक्सपोर्ट बूस्ट जैसा लगता है
लेकिन असली सवाल यह है:
इसकी कीमत कौन चुका रहा है?
जब किसी एक देश या संसाधन पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ती है, तो
ऊर्जा लागत बढ़ती है
आयात–निर्यात का संतुलन बिगड़ता है
और दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था कमजोर होती है
आत्मनिर्भर भारत केवल एक नारा नहीं,
बल्कि स्थानीय संसाधनों पर भरोसे की नीति है—
खासतौर पर ऊर्जा के क्षेत्र में।
तेल लॉबी और राजनीतिक शोर
दुनिया जानती है कि पेट्रोलियम लॉबी कितनी ताक़तवर है।
विकास के नाम पर—
संसाधन सस्ते सौंप दिए जाते हैं
पर्यावरणीय चेतावनियाँ अनसुनी रह जाती हैं
और संसद का शोर असली मुद्दों को ढक देता है
आज स्थिति यह है कि
दिल्ली जैसे शहरों में रहने वाला एक आम नागरिक
बिना सिगरेट पिए रोज़ ज़हर साँस में ले रहा है।
यह केवल प्रदूषण नहीं—
यह नीति की विफलता है।
गोबर गैस — जो समाधान था, उसे भुला दिया गया
70–80 के दशक में भारत ने गोबर गैस को भविष्य की ऊर्जा माना था।
लाखों संयंत्र लगे, गाँवों में रोशनी आई, ईंधन मिला।
बाद में GOBAR-DHAN और SATAT जैसी योजनाएँ शुरू हुईं,
जिनका उद्देश्य था—
किसानों की आय बढ़ाना
कचरे से ऊर्जा बनाना
और तेल आयात कम करना
आज भी सच्चाई यही है कि
अगर गोबर गैस को ईमानदारी से और बड़े स्तर पर अपनाया जाए, तो
अरबों डॉलर का आयात बच सकता है
गाँव आत्मनिर्भर बन सकते हैं
और धरती माँ को वास्तविक राहत मिल सकती है
यह केवल एक तकनीक नहीं—
यह गौमाता से जुड़ी जीवन-पद्धति है।
निष्कर्ष: फैसला हमें करना है
तेल लॉबी का रास्ता आसान है
लेकिन विनाशकारी।
गोबर गैस, सोलर और स्थानीय समाधान
रास्ता थोड़ा कठिन है,
पर स्थायी और स्वाभिमानी है।
आज सवाल यह नहीं कि
सरकार क्या कर रही है,
सवाल यह है कि—
हम क्या स्वीकार कर रहे हैं।
यदि यह लेख आपको सोचने पर मजबूर करे,
तो इसे साझा करें,
बात करें,
और धरती माँ की आवाज़ को आगे बढ़ाएँ।
— रोहित थपलियाल
(DeshDharti360.com | चेतना, संस्कृति और समाधान)
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