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युद्धों की कीमत: जब राष्ट्रों का खून बहता है और पूंजीपतियों की तिजोरियाँ भरती हैं
“हम सम्मानपूर्वक यह देख रहे हैं कि 1990 के बाद से अमेरिका ने विश्व में शांति की बजाय संघर्षों पर अधिक निवेश क्यों किया?” “ट्रंप जी, आपने यह आशा जताई थी कि युद्ध कम होंगे—लेकिन आँकड़े बताते हैं कि खर्च बढ़ता गया।” “यह लेख न केवल युद्धों के खर्च पर है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे बड़े उद्योग युद्ध-उत्पादन सिस्टम से लाभान्वित हुए।” “हम आपसे यह विनम्र प्रश्न पूछते हैं: क्या युद्धों के बजाय सामाजिक विकास में निवेश नहीं होना चाहिए था?”
युद्ध और मानवताOPINION / ANALYSISविश्लेषण / विचारधारा
रोहित थपलियाल
1/23/2026


विश्व इतिहास का बीता हुआ हर दशक गवाही देता है कि युद्ध कभी शांति नहीं लाते—वे केवल कब्रों की संख्या और कंपनियों के मुनाफ़े बढ़ाते हैं। 1990 के बाद से आज तक, जब शीत युद्ध की राख ठंडी होनी चाहिए थी, तब भी दुनिया नए-नए संघर्षों की आग में झोंकी जाती रही। इस आग का सबसे बड़ा ईंधन बना—युद्ध उद्योग।
1990 के दशक से लेकर आज तक, संयुक्त राज्य अमेरिका ने प्रत्यक्ष और परोक्ष युद्धों पर खरबों डॉलर खर्च किए। विशेषकर 9/11 के बाद, केवल “आतंक के विरुद्ध युद्ध” के नाम पर लगभग 8 ट्रिलियन डॉलर (यानी 8 लाख करोड़ डॉलर से अधिक) की राशि झोंकी गई—जिसमें इराक, अफ़ग़ानिस्तान और अनेक सैन्य हस्तक्षेप शामिल हैं। यह आँकड़ा सिर्फ़ बंदूकों और बमों का नहीं, बल्कि ऋण के ब्याज, सैनिकों की भविष्य देखभाल और सुरक्षा तंत्र तक फैला हुआ है ।
पर प्रश्न यह है—इस कीमत का लाभ किसे मिला?
उत्तर कड़वा है: आम नागरिक को नहीं।
इसी अवधि में रक्षा अनुबंधों का बड़ा हिस्सा निजी रक्षा कंपनियों को मिला। 2019–2024 के बीच ही, पेंटागन के रक्षा बजट का लगभग आधा से अधिक हिस्सा निजी ठेकेदारों को गया—हथियार, लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा सेवाएँ, और युद्ध-प्रबंधन सॉफ़्टवेयर तक ।
युद्ध बढ़े—तो अनुबंध फूले।
अनुबंध फूले—तो कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों की संपत्ति कई गुना बढ़ी।
और आम अमेरिकी?
उसी दौर में मध्यवर्गीय आय की वास्तविक वृद्धि ठहरी रही, शिक्षा-स्वास्थ्य महँगे होते गए, और करदाताओं के धन से दूसरे देशों की ज़मीन पर विनाश लिखा जाता रहा। यह विरोधाभास केवल आर्थिक नहीं—नैतिक भी है।
युद्ध का तर्क अक्सर “राष्ट्रीय सुरक्षा” बताया जाता है। पर यदि सुरक्षा का अर्थ मानव जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य है—तो सवाल उठता है कि क्या खरबों डॉलर का यह रास्ता सही था? क्या वही धन अपने नागरिकों के जीवन को सुरक्षित करने में नहीं लगाया जा सकता था?
इतिहास हमें सिखाता है:
युद्ध जीतने वाला भी अंततः हारता है—
क्योंकि वह मानवता हार जाता है।
आज दुनिया के देशों के सामने एक स्पष्ट विकल्प है—
आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, सीमित विदेशी निर्भरता, और शांति-आधारित विकास।
क्योंकि जो राष्ट्र अपने बच्चों के स्कूलों पर नहीं, युद्धों पर निवेश करता है—वह आने वाली पीढ़ियों से भविष्य उधार लेता है।
खुला पत्र
अमेरिका की जनता और श्री डोनाल्ड ट्रंप के नाम—सम्मान सहित
माननीय नागरिकों और श्री ट्रंप,
यह पत्र आरोप नहीं, आत्ममंथन का निमंत्रण है।
आपका देश विज्ञान, स्वतंत्रता और अवसरों का प्रतीक रहा है। पर 1990 से आज तक की यात्रा में, एक प्रश्न बार-बार उभरता है—क्या युद्धों ने आपको वह दिया, जो वादा किया गया था?
आँकड़े बताते हैं कि 9/11 के बाद के युद्धों पर लगभग 8 ट्रिलियन डॉलर खर्च हुए । यह राशि—यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और अवसंरचना में लगती—तो कितने परिवार सुरक्षित होते? कितने युवाओं का भविष्य बनता?
इसी बीच, रक्षा उद्योगों को मिले विशाल अनुबंधों ने कुछ कंपनियों और निवेशकों की संपत्ति को तेज़ी से बढ़ाया । पर आम नागरिक की जेब—उसी अनुपात में भारी नहीं हुई। यह अंतर केवल आर्थिक नहीं; यह लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है।
श्री ट्रंप, आपने अपने कार्यकाल में युद्ध कम करने की बात कही। यह आशा आज भी जीवित है। पर आशा तभी विश्वास बनेगी, जब नीतियों का केंद्र युद्ध-विस्तार नहीं, मानव-विकास होगा।
अमेरिकी जनता से एक विनम्र निवेदन—
अपने करों के उपयोग पर प्रश्न पूछिए।
पूछिए कि क्या आपकी मेहनत की कमाई शांति गढ़ रही है या मुनाफ़े का युद्ध?
यह पत्र शत्रुता नहीं, साझी मानवता की पुकार है।
क्योंकि जब बम गिरते हैं—तो सीमाएँ नहीं पूछते,
और जब कर्ज़ बढ़ता है—तो आने वाली पीढ़ियाँ चुकाती हैं।
सम्मान सहित,
Rohit Thapliyal
भारत

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