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मैं हारा नहीं हूँ — बस रुका था
संघर्ष, बीमारी और ठहराव के बीच यह लेख बताता है कि रुकना हार नहीं होता। आत्मसम्मान, चेतना और वापसी की सच्ची कहानी।
आत्मचिंतन
rohit thapliyal
1/3/20261 मिनट पढ़ें


कभी-कभी जीवन में ऐसा समय आता है जब आदमी आगे नहीं बढ़ पाता।
पैरों में जंजीर नहीं होती,
रास्ता भी दिख रहा होता है,
फिर भी कदम थमे रहते हैं।
समाज ऐसे समय को एक शब्द दे देता है — हार।
लेकिन सच यह है कि
हर ठहराव हार नहीं होता,
और हर चुप्पी कमजोरी नहीं होती।
कुछ रुकावटें शरीर की होती हैं,
कुछ परिस्थितियों की,
और कुछ ऐसी होती हैं जो मनुष्य को
अंदर से फिर से गढ़ने आती हैं।
मैं भी ऐसे ही एक दौर से गुज़रा हूँ।
रुकना और हारना — दो अलग सच
पिछले कुछ वर्षों में मैंने सीखा कि
रुकना और हारना एक जैसे नहीं होते।
रुकना वह क्षण है
जब इंसान अपनी साँसें गिनता है,
अपनी गलतियों को पहचानता है,
और अपने भीतर की आवाज़ को सुनता है।
हार तब होती है
जब आदमी यह मान ले कि
अब उठना संभव नहीं।
मैं रुका था,
क्योंकि शरीर ने साथ नहीं दिया,
पर मन ने कभी हथियार नहीं डाले।
आज जब पीछे देखता हूँ
तो समझ आता है कि
अगर वह ठहराव न आता,
तो शायद मैं आज भी
उसी दौड़ में भाग रहा होता
जो मुझे कहीं नहीं ले जा रही थी।
बीमारी, चुप्पी और समाज का फैसला
बीमारी सिर्फ शरीर को नहीं घेरती,
वह इंसान की पहचान को भी चुनौती देती है।
कमाई रुक जाती है,
लोग सवाल पूछने लगते हैं,
और धीरे-धीरे
इंसान खुद को
दूसरों की निगाह से देखने लगता है।
यही सबसे खतरनाक मोड़ होता है।
क्योंकि जब आदमी
दुनिया की परिभाषा को
अपनी सच्चाई मान लेता है,
तब वह सच में हारने लगता है।
लेकिन मैंने सीखा —
हर बीमारी संदेश होती है,
हर रुकावट चेतावनी होती है,
और हर अंधेरा
दिशा बदलने का इशारा भी हो सकता है।
जब जीवन चुप कर देता है, तब आत्मा बोलती है
कुछ समय ऐसे होते हैं
जब जीवन बाहर से बिल्कुल शांत दिखता है,
लेकिन भीतर एक नई समझ जन्म ले रही होती है।
मैंने उसी चुप्पी में जाना कि
मेरी कीमत
मेरी कमाई से नहीं,
मेरी चेतना से तय होती है।
मैंने जाना कि
जो आदमी गिरकर भी
अपने विचारों को बचा लेता है,
वह कभी पराजित नहीं होता।
यह देश, यह समाज,
और यह धरती —
हमसे सिर्फ दौड़ नहीं मांगते,
वे हमसे जिम्मेदार चेतना मांगते हैं।
DeshDharti360 इसी चेतना का नाम है।
आत्मसम्मान परिस्थितियों से बड़ा होता है
कर्ज हो सकता है,
कमज़ोरी आ सकती है,
पर आत्मसम्मान गिरना
सबसे खतरनाक हार है।
मैंने तय किया कि
मैं हालात से लड़ूँगा,
लेकिन खुद से समझौता नहीं करूँगा।
मैं आज भी कह सकता हूँ —
मैं हारा नहीं हूँ,
मैं बस तैयारी में था।
क्योंकि जो इंसान
खुद को समझ लेता है,
वह देर से सही,
लेकिन सही जगह पहुँचता है।
यह लेख किसी एक व्यक्ति का नहीं
यह लेख सिर्फ मेरी कहानी नहीं है।
यह हर उस इंसान की आवाज़ है
जो चुपचाप संघर्ष कर रहा है।
अगर आप भी
कभी रुके हैं,
कभी टूटे हैं,
या आज खुद को
असफल मान बैठे हैं —
तो याद रखिए,
रुका हुआ व्यक्ति ख़त्म नहीं होता,
वह अक्सर सबसे सशक्त वापसी करता है।
अंतिम शब्द (DeshDharti360 की आत्मा से)
यह धरती, यह देश,
और यह समाज
हमें गिरने की अनुमति देते हैं,
पर हार मानने की नहीं।
अगर आप आज भी खड़े हैं,
अगर आज भी सोच रहे हैं,
तो समझिए —
आप हारे नहीं हैं।
आप बस रुके थे।
आपका संकल्प-पत्र बन चुका है
मैं अभी हारा नहीं, जान बाकी है,
मुश्किलें सामने हैं मगर हाथों में कमान बाकी है।
नहीं थकूँगा अभी मैं,
क्योंकि हौसलों की उड़ान बाकी है।

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