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अरावली : 100 मीटर की रेखा, कोयले का धुआँ और उत्तर भारत के भविष्य पर मंडराता जलवायु संकट (Human • Climate • Policy)
अरावली का 90% हिस्सा 100 मीटर से नीचे है। खनन, कोयला और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कैसे उत्तर भारत की जलवायु को प्रभावित कर रहा है—एक संवेदनात्मक रिपोर्ट।
पर्यावरण और धरती माँ
रोहित थपलियाल
12/21/20251 मिनट पढ़ें



भूमिका : जब सभ्यता ने पहाड़ों से उनकी ऊँचाई पूछनी शुरू की
प्रिय मित्र,
इतिहास गवाह है —
किसी भी सभ्यता का पतन तब शुरू होता है
जब वह प्रकृति से यह पूछने लगे कि
“तुम कितने मीटर के हो?”
अरावली…
जो करोड़ों वर्षों से
रेगिस्तान और जीवन के बीच
एक मौन प्रहरी की तरह खड़ी है,
आज उससे पूछा जा रहा है —
“क्या तुम 100 मीटर से ऊपर हो
या 100 मीटर से नीचे?”
और इसी प्रश्न में
उत्तर भारत का भविष्य छुपा है।
अरावली — पहाड़ नहीं, जलवायु की धड़कन
अरावली पर्वतमाला
दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत प्रणालियों में से एक है।
यह इतनी पुरानी है कि
हिमालय भी इसके सामने युवा प्रतीत होता है।
लेकिन अरावली की असली पहचान
उसकी ऊँचाई नहीं,
उसकी भूमिका है।
अरावली:
थार मरुस्थल की तपती हवाओं को रोकती है
उत्तर भारत में नमी बनाए रखती है
मानसून को थामने का काम करती है
ज़मीन के भीतर पानी उतारती है
तापमान को संतुलन में रखती है
जब अरावली जीवित रहती है,
तो मौसम कठोर नहीं होता।
गर्मी सहनीय होती है।
रातें ठंडी हो पाती हैं।
आज जब दिल्ली-NCR में
गर्मी उतरने का नाम नहीं लेती,
तो यह केवल मौसम नहीं —
अरावली की अनुपस्थिति का दर्द है।
100 मीटर का निर्णय — नीयत और परिणाम के बीच की खाई
Supreme Court of India
ने खनन को नियंत्रित करने के उद्देश्य से
यह व्यवस्था दी कि —
100 मीटर से ऊपर की पहाड़ियाँ → खनन से बाहर
100 मीटर से नीचे → सशर्त खनन संभव
नीयत गलत नहीं थी।
अवैध खनन को रोकना आवश्यक था।
लेकिन यहाँ एक बुनियादी भूल हो गई।
प्रकृति ऊँचाई से नहीं, प्रभाव से पहचानी जाती है।
100 मीटर से नीचे की पहाड़ी भी
उतनी ही ज़रूरी है जितनी 200 मीटर की।
वह भी:
पानी रोकती है
मिट्टी थामती है
हवा को ठंडा करती है
लेकिन काग़ज़ ने उसे
“कम महत्वपूर्ण” घोषित कर दिया।
अरावली का 90% — क़ानूनन बलिदान
यह तथ्य दिल को चीर देता है, मित्र।
अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा
100 मीटर से नीचे है।
इसका अर्थ साफ़ है —
संरक्षण अपवाद बन गया है,
और विनाश नियम।
जहाँ कभी
छोटी-छोटी पहाड़ियाँ थीं,
आज वहाँ हैं —
गहरी खदानें
उड़ती सिलिका धूल
टूटे जलमार्ग
और मौन धरती
वह धरती अब
बारिश को पहचानती भी नहीं।
खनन — जहाँ सबसे पहले पानी मरता है
इतिहास, विज्ञान और अनुभव —
तीनों एक स्वर में कहते हैं:
जहाँ खनन जाता है,
वहाँ पानी सबसे पहले मरता है।
अरावली में खनन का मतलब है:
भूजल की नसों का कटना
जलभृतों का टूटना
तालाबों का स्मृति बन जाना
आज जिन गाँवों में
महिलाएँ कई किलोमीटर दूर से
पानी लाती हैं,
वहाँ कभी अरावली की गोद में
पानी स्वयं बाहर आता था।
यह केवल जल संकट नहीं।
यह मानवीय पीड़ा है।
कोयला — विकास नहीं, जलवायु पर दोहरा आघात
अब उस शब्द पर आते हैं
जिसे “ऊर्जा” कहकर छुपा दिया जाता है —
कोयला।
कोयला दो बार वार करता है।
पहला वार — खनन के समय
जंगल नष्ट
पहाड़ समतल
कार्बन-सिंक समाप्त
दूसरा वार — जलने के बाद
भारी मात्रा में CO₂
PM2.5, SO₂, NOx
आसमान पर गर्मी की मोटी परत
मतलब स्पष्ट है —
पहले प्रकृति की ढाल तोड़ो,
फिर उसी से धुआँ बनाकर
पूरी सभ्यता को ढक दो।
यह विकास नहीं।
यह भविष्य पर उधार लिया गया ज़हर है।
जलवायु डेटा — जब आँकड़े भी डराने लगें
पिछले वर्षों में उत्तर भारत में:
हीटवेव के दिन बढ़े
रातें भी ठंडी नहीं होतीं
मानसून अनियमित हुआ
वर्षा के बाद भी जलस्तर नहीं बढ़ता
वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं:
अरावली का क्षरण
Urban Heat Island Effect को
कई गुना बढ़ा रहा है।
यह भविष्यवाणी नहीं।
यह वर्तमान की सच्चाई है।
नीति बनाम प्रकृति — जीत हमेशा किसकी होती है?
नीति कहती है:
“थोड़ा नुकसान स्वीकार्य है।”
प्रकृति कहती है:
“संतुलन में थोड़ा भी नहीं चलता।”
इतिहास बताता है —
प्रकृति कभी तुरंत नहीं,
लेकिन अंततः पूरा हिसाब चुकाती है।
यह अरावली नहीं, हम टूट रहे हैं
प्रिय मित्र,
अरावली को काटते-काटते
हमने —
हवा काट दी
पानी काट दिया
और अब भविष्य काट रहे हैं
जो सभ्यता अपने पहाड़ों को खो देती है,
वह इतिहास में
केवल एक चेतावनी बनकर रह जाती है।
आज भी समय है।
लेकिन समय बहुत कम है।
यदि यह लेख आपको असहज करता है,
तो समझिए यह अपना काम कर गया।
क्योंकि प्रकृति कभी चुपचाप नहीं मरती—
वह पहले हमें जगाती है।

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